बस राहे बदल गई
बर्बाद जो जिंदगी हुई इसकदर
हर एक साँस बंदगी बन गई
राहो मैं जो बिछे फूल ओ कांटे बन गए
दिन मैं भी अंधेरो के सन्नाटे बन गए
आसमान से हाथ था उस खुदा का
अब वहां भी काले बादल जमा हो गए
हर राह बंद हुई जैसे कभी न खुलेगी
हर वो मंजिल तबाह हुई जो न मिलेगी
फिर सोचा हमने भी हम उनके है पर
उनसे नज़रे मिलाने की हमारी औकात नहीं
सोच समझकर ऐसे जुदा हुए जैसे आप हमारे नहीं
आप के और हमारे ख्वाब जो थे वो अधूरे रह गये
अब भी हम है उनके हम थे जिनके
पर ख्वाब मैं ....
बस ख्वाब मैं ....
बस ख्वाब मैं....
बस ख्वाब मैं ....
बस ख्वाब मैं....
गणेश पुरी सिमनगावकर
gspindiablogs@gmail.com
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